चेन्नई की बारिश बजा रही खतरे की घंटी, बांग्लादेश-श्रीलंका पर विलुप्त होने का खतरा

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नई दिल्ली, [स्पेशल डेस्क]। तमिलनाडु के अन्य तटीय इलाकों सहित चेन्नई में पिछले कुछ दिनों से बारिश कहर बरपा रही है। यहां लगातार हो रही बारिश की वजह से स्कूल-कॉलेजों को बंद कर दिया गया है। सरकार ने शुक्रवार को आईटी कंपनियों को भी बंद रखने की सलाह दी और कहा कि लोगों को वर्क फ्रॉम होम की सुविधा दें। जानकार चेन्नई की बारिश को क्लाइमेट चेंज से जोड़कर देखते हैं और उनका कहना है कि अगर अब भी हम न चेते तो बांग्लादेश-श्रीलंका जैसे देश सुमद्र में समा जाएंगे।

चेन्नई में क्यों हुई इतनी बारिश

मौसम विभाग का कहना है कि श्रीलंका के नजदीक बंगाल की खाड़ी में कम दबाव के कारण गुरुवार शाम को लगातार पांच घंटे हुई बारिश के कारण तमिलनाडु के अनेक इलाकों में पानी भर गया। गुरुवार शाम बारिश के कारण सड़कों पर ट्रैफिक की धीमी रफ्तार के कारण लोगों को काफी परेशानियों का सामना करना पड़ा। दक्षिण चेन्‍नई व मरीना बीच पर भी घुटनों तक पानी में लोग गाड़ियों को धक्‍का लगाते देखे गए। कॉर्पोरेशन कमिश्‍नर डॉ. डी कार्तिकेयन ने कहा, ‘लोगों को घबराने की जरूरत नहीं है। समुद्र के निकट के क्षेत्रों में अच्‍छी बारिश हुई है। बारिश के बंद होते ही पानी कम हो जाएगा। बकिंघम नहर व कोउम नदी में यह सब पानी चला जाएगा।

2015 में हालात थे काफी खराब

साल 2015 में भी चेन्नई को भारी बारिश के कारण बड़ी दिक्कतों का सामना करना पड़ा था। नवंबर के अंतिम और दिसंबर के पहले हफ्ते में यहां जोरदार बारिश के कारण जबरदस्त जल-भराव हो गया था। उस भयंकर बाढ़ में 150 से ज्यादा लोगों की जान भी चली गई थी। बारिश ने पिछले 100 साल का रिकॉर्ड तोड़ दिया था, जिसके चलते चेन्नई, तिरुवल्लुर और कांचीपुरम जिलों में जनजीवन पूरी तरह से अस्त-व्यस्त हो गया था। चेन्नई के एयरपोर्ट पर भी जल-भराव हो गया था, जिसकी वजह से कई उड़ाने रद करनी पड़ी और हजारों लोग एयरपोर्ट पर ही फंसे रह गए थे। एयरपोर्ट को कई दिनों के लिए बंद करना पड़ा और करंट फैलने के डर की वजह के कई इलाकों में बिजली काटनी पड़ी थी।

एक्सपर्ट बोले मैन-मेड डिजास्टर है ये…

दैनिक जागरण ने इस बारे में पर्यावरणविद् विमलेंदू झा से बात की। उन्होंने कहा, इसमें कोई शक नहीं कि बारिश काफी ज्यादा हो रही है। लेकिन इससे निपटने के लिए जिस तरह के इंफ्रास्ट्रक्चर की जरूरत है वह जमीन पर नहीं है। उन्होंने कहा, यह तटीय इलाका है, बारिश ज्यादा हुई है और पहले भी होती रही है। लेकिन वहां नदियों पर जो अतिक्रमण हुआ है, पानी की प्राकृतिक निकासी के साधन झीलों पर भी कब्जा कर लिया गया है, जिसकी वजह से समस्या ज्यादा विकराल हो गई है।  वे कहते हैं, अतिक्रमण कानूनी और गैरकानूनी दोनों तरह का है। कानूनी अतिक्रमण में आप देखेंगे तो कहीं पर पावर प्रोजेक्ट बना दिया गया है तो कहीं समुद्र किनारे के क्रीक एरिया में रोड और पोत बनाए गए हैं। विमलेंदू चेन्नई की मौजूदा बाढ़ और 2015 की भयावह बाढ़ को भी मैन-मेड डिजास्टर बताते हैं। वह कहते हैं सरकारों ने कुछ काम नहीं किए (जिन्हें किया जाना था) और कुछ गलत काम किए (जिन्हें नहीं किया जाना चाहिए था) इसी वजह से आज हालात भयावह बने हुए हैं।

सरकार के दावों की खोली पोल

विमलेंदू बताते हैं कि उन्होंने हाल ही में तमिलनाडु सरकार से बात की है। उनके अनुसार तमिलनाडु सरकार ने उन्हें बताया कि नदियों और पानी निकासी के अन्य स्रोतों को डिसिल्ट (साफ) किया है। ऐसे में विमलेंदू सवाल उठाते हैं कि अगर डिसिल्ट किया है तो फिर ऐसे हालात क्यों बने? ऐसा नहीं होना चाहिए था।

क्लाइमेट चेंज भी एक विलेन

विमलेंदू झा से दैनिक जागरण ने सवाल किया कि सरकार की योजनाओं की खामियां एक तरफ, लेकिन जिस कदर बारिश हो रही है। क्या वैसी बारिश से निपटने के लिए कोई भी शहर पूरी तरह से तैयार हो सकता है? इस पर उन्होंने कहा, क्लाइमेट चेंज का असर तो है। क्लाइमेट चेंज के कारण मौसम में तीव्र बदलाव भी आ रहे हैं। लेकिन समस्या ये है कि हम लोग मौसम में आ रहे इस बदलाव की तरफ ध्यान ही नहीं दे रहे। पर्यावरण में हो रहा बदलाव भी मानव जनित ही हैं। इन बदलावों से निपटने के लिए भी कुछ कदम उठाने पड़ेंगे, लेकिन हम उसे समझ ही नहीं रहे। दुनिया के अन्य देश भी (विकसित और विकासशील) भी पर्यावरण में हो रहे बदलावों को झेल रहे हैं, लेकिन अमेरिका-जर्मनी के मुकाबले हमारे यहां जान-माल का नुकसान ज्यादा होता है।

दुनिया के बहुत सारे देश हो जाएंगे विलुप्त

विमलेंदू कहते हैं कि जिस तरह के पर्यावरण में बदलाव देखने को मिल रहा है और ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं उससे आने वाले समय में की देश समुद्र में समा जाएंगे। वे कहते हैं इससे दुनिया का नक्शा ही बदल जाएगा। बांग्लादेश और श्रीलंका पानी में विलुप्त हो जाएंगे। ग्लेशियर की बात हो रही है तो बता दें कि आर्कटिक घेरे में स्थित ग्रीनलैंड के बर्फ क्षेत्र में पृथ्वी का दस फीसद मीठा पानी है। अगर वहां की बर्फ पिघलती है तो समुद्र का स्तर इस सदी के अंत तक 74 सेमी से भी अधिक बढ़ जाएगा, जो ख़तरनाक साबित हो सकता है। इससे मुंबई, चेन्नई, मेलबर्न, सिडनी, केपटाउन, शांघाई, लंदन, लिस्बन, कराची, न्यूयार्क, रियो-डि जनेरियो जैसे दुनिया के तमाम खूबसूरत और समुद्र के किनारे बसे शहरों को ख़तरा हो सकता है।

 

बता दें कि समुद्र का पानी बर्फ के मुकाबले गहरे रंग का होता है। ऐसे में यह ज्यादा गर्मी सोखता है। आर्कटिक पर जितनी ज्यादा बर्फ पिघलेगी, उतना ही अधिक पानी गर्मी को सोखेगा, जिससे बर्फ पिघलने की रफ्तार और भी ज्यादा बढ़ जाएगी। मेलबर्न विश्वविद्यालय के शोध के अनुसार 2026 तक धरती का तापमान 1.5 डिग्री तक बढ़ जाएगा, इस तरह से अनुमान लगाया जा सकता है कि धरती का तापमान कितनी तेजी से बढ़ रहा है। अगर इसी रफ्तार से धरती का तापमान बढ़ता रहा तो ग्लेशियरों की बर्फ पिघलने की रफ्तार और भी बढ़ेगी।

 

विकास के मॉडल में बदलाव की जरूरत

पर्यावरणविद् विमलेंदू झा कहते हैं कि पर्यावरण में आ रहे बदलावों के अनुसार हमें अपने विकास के मॉडल में भी बदलाव करने की जरूरत है। हमें समझना होगा कि हम प्रकृति के साथ और ज्यादा छेड़छाड़ नहीं कर सकते। इसके बावजूद भी अगर हम और ज्यादा मैंग्रोव को नष्ट करेंगे। पेड़-पौधे काटेंगे या समुद्री क्रीक में पोत निर्माण करेंगे तो इस तरह के विकास का खामियाजा भुगतने के लिए भी हमें तैयार रहना चाहिए।

 

पैरिस पैक्ट कितना कारगर

हालांकि विमलेंदू पैरिस पर्यावरण पैक्ट जैसे समझौतों को लेकर ज्यादा आशावान तो नजर नहीं आते, लेकिन वे कहते हैं कि पहले तमाम देशों को अपने-अपने स्तर पर कार्बन उत्सर्जन पर रोक लगानी होगी। लेकिन यह समझौते अनिवार्य रूप से लागू नहीं हैं, इसमें इच्छा अनुसार शामिल होने की बात है। वे कहते हैं कोपेनहेगन से पैरिस तक आते-आते पर्यावरण संरक्षण को लेकर बात आगे तो बढ़ी है, लेकिन सरकारों को चाहिए कि वे अपनी विकास योजनाएं इन समझौतों को ध्यान में रखकर बनाएं तो हालात काबू में आ सकते हैं।